प्रस्तावना: इंटरनेट का नया बबल और बदलता समाज
भारत में डिजिटल क्रांति के बाद इंटरनेट जितना सस्ता हुआ, आम जनता की पहुँच डिजिटल कंटेंट तक उतनी ही तेज़ी से बढ़ी। इस टेक्नोलॉजी के विस्तार ने एक नए करियर को जन्म दिया जिसे आज हम ‘कंटेंट क्रिएशन’ या ‘इन्फ्लुएंसर इकॉनमी’ के नाम से जानते हैं। शुरुआत में जब लोग यूट्यूब पर आए, तो आम जनता ने उन्हें इसलिए सर-आंखों पर बिठाया क्योंकि वे रिलेटेबल थे। उन्हें देख कर लगता था कि हमारे ही बीच का कोई आम लड़का या लड़की, बिना किसी बॉलीवुड बैकग्राउंड या बड़े गॉडफादर के, सिर्फ अपनी मेहनत के दम पर आगे निकल रहा है। ये इन्फ्लुएंसर्स आम आदमी का चेहरा बनकर उभरे थे।
लेकिन पिछले कुछ सालों में यह रिलेटेबल डिजिटल स्पेस पूरी तरह से बदल चुका है। आज का इन्फ्लुएंसर कल्चर एक सस्ता विक्टिम-कार्ड सिंडिकेट और टॉक्सिक ईगो बबल बन चुका है। जब बिग बॉस 20 जैसे बड़े नेशनल रियलिटी शोज़ पर गेमिंग स्ट्रीमर्स जैसे स्काउट ओपी या विवादित चेहरे जैसे रजत दलाल और नए वाइल्डकार्ड्स जैसे नकुल ढुल आते हैं, तो उनका चाल-चलन देख कर देश की पढ़ी-लिखी और समझदार ऑडियंस का खून खौल उठता है। नेशनल टेलीविजन पर सलमान खान जैसे दिग्गज होस्ट्स को आंखें दिखाना, बीमार कंटेस्टेंट्स (जैसे काज़ी तौकीर) के साथ बदतमीजी करना, और स्क्रीन के पीछे जाकर “इसपे थोड़े ना सुनूंगा” जैसे अहंकारी डायलॉग्स मारना इस बात का सबूत है कि इंटरनेट ने कम उम्र के लड़कों को पैसा तो दे दिया, पर बेसिक मैनर्स और इंसानियत नहीं सिखाई [r/biggboss]।
1. प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन बनाम इन्फ्लुएंसर कल्चर: ‘इज़ी मनी’ का असर

आज के डिजिटल मार्केट की सबसे बड़ी और भयानक रियलिटी यह है कि कंटेंट क्रिएशन में अचानक आया पैसा पुरानी वैल्यूज को खत्म कर रहा है।
एक नॉर्मल प्रोफेशनल बैकग्राउंड का युवक सालों-साल इंजीनियरिंग, मेडिकल, एमबीए या नॉर्मल ग्रेजुएशन की पढ़ाई में लगाता है। दिन-रात असाइनमेंट्स, एग्जाम्स, इंटरव्यू की तैयारी और कॉर्पोरेट प्रेशर झेलने के बाद भी, जब वो मार्केट में निकलता है, तो उसे एक शुरुआती नौकरी के लिए बहुत ज़्यादा भटकना पड़ता है। जो लोग इस तरह के प्रोफेशनल स्ट्रगल से गुजरने के बाद आगे बढ़ते हैं, उन्हें पता होता है कि एक-एक पैसा कमाने के लिए कितना प्रोफेशनल डिसिप्लिन और मेहनत लगती है। इस स्ट्रगल से इंसान के अंदर विनम्रता (तमीज और ज़मीन पर पांव रखना) आती है।
इसके बिल्कुल विपरीत, इन आज कल के इन्फ्लुएंसर्स का पूरा सेटअप अलग होता है:
- बिना स्ट्रगल का पैसा: 18 से 22 साल की उम्र में, जब दिमाग पूरी तरह मैच्योर भी नहीं होता, तब सिर्फ एक गेमिंग कंसोल या कैमरा के सामने बैठकर चिल्लाने से इनको लाखों-करोड़ों रुपये मिलने लगते हैं।
- एथिक्स की कमी: क्योंकि इन्होंने कभी किसी फॉर्मल कॉर्पोरेट ऑफिस में काम नहीं किया, कभी किसी बॉस की डांट नहीं सुनी, और ना ही किसी रियल-वर्ल्ड स्टैंडर्ड का प्रेशर झेला, इसीलिए इनके अंदर प्रोफेशनल एथिक्स और डिसिप्लिन जीरो होता है।
- औरा का झूठ: जब कैमरा के सामने बैठकर गेम खेलने से इतना पैसा आ जाता है, तो इनके दिमाग में एक फेक ‘औरा’ और ‘किंग’ होने का वहम पैदा हो जाता है। उन्हें लगता है कि अगर वे अपने चैट रूम के राजा हैं, तो वे रियल लाइफ में भी किसी को भी दबा सकते हैं।
2. द अटेंशन इकॉनमी: पैसा कहां से आता है?
बाहर से देखने पर लगता है कि ये लोग बेहिसाब कमाते हैं, पर इस फाइनेंशियल सेटअप के पीछे एक बहुत बड़ा कॉर्पोरेट एल्गोरिदम छुपा है।
भुवन बाम का रियलिटी चेक
देश के सबसे मैच्योर और पुराने क्रिएटर्स में से एक, भुवन बाम (बीबी की वाइंस) ने कई बार बड़े प्लेटफॉर्म्स पर खुलकर बोला है कि इंटरनेट पर जो क्रिएटर्स की ‘100 करोड़ नेट वर्थ’ या ’50 लाख मंथली इनकम’ की खबरें आती हैं, वो बहुत हद तक फेक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती हैं। भुवन बाम ने साफ किया है कि यूट्यूब इंडिया का एडसेंस सिस्टम (व्यूज का पैसा) इतना ज़्यादा नहीं होता कि कोई सिर्फ वीडियो डाल कर करोड़पति बन जाए। यूट्यूब व्यूज से महीने का मुश्किल से ₹2-4 लाख ही बन पाता है, वो भी तब जब आपके व्यूज मिलियंस में लगातार आ रहे हों।
तो फिर ये इन्फ्लुएंसर्स मोटा पैसा कैसे कमाते हैं?
इनकी कमाई का असली सोर्स यूट्यूब का एडसेंस नहीं, बल्कि थर्ड-पार्टी कॉर्पोरेट्स हैं:
- ब्रांड स्पॉन्सरशिप (सबसे मोटा पैसा): किसी वीडियो के बीच में 30-सेकंड का किसी टेक प्रोडक्ट, लैपटॉप, हेडफ़ोन या आज कल चल रहे ऑनलाइन बेटिंग और क्रिप्टो ऐप्स का प्रमोशन करने के लिए ये लोग एक सिंगल डील का लाखों रुपये चार्ज करते हैं।
- एक्सक्लूसिव स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट्स: गेमिंग प्लेटफॉर्म्स और यूट्यूब इन बड़े स्ट्रीमर्स को अपने प्लेटफॉर्म पर लाइव रहने के लिए भारी फिक्स्ड मंथली रिटेंशन फीस देते हैं।
- पेड सुपरचैट्स: उनके चैट रूम में बैठे 14-16 साल के बच्चे, जो अपने माता-पिता के पैसों से इन्हें स्क्रीन पर अपना नाम सुनने के लिए सुपरचैट्स भेजते हैं, उससे इनका एक अलग डेली रेवेन्यू जनरेट होता है।
द ग्रॉस बनाम नेट का झूठ
जो इन्फ्लुएंसर बोलता है कि वो ₹30 लाख कमा रहा है, वो कभी अपना प्रॉफिट एंड लॉस स्टेटमेंट नहीं दिखाएगा:
- टैक्स: इनकम का एक बड़ा हिस्सा सीधा सरकारी टैक्स और जीएसटी में चला जाता है।
- भारी खर्चे (ओवरहेड एक्सपेंसेस): एक बड़ा क्रिएटर अकेले काम नहीं करता। उनके पास वीडियो एडिटर्स, थंबनेल डिजाइनर्स, पीआर मैनेजर्स, सोशल मीडिया हैंडलर्स और हाई-एंड इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर की एक पूरी टीम होती है जिन्हें हर महीने लाखों रुपये की सैलरी देनी पड़ती है। एस्पोर्ट्स टीमों के गेमिंग हाउस का रेंट और प्लेयर्स की मेंटेनेंस का खर्चा भी इसी इनकम से निकलता है।
- लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन (दिखावे का खर्ची): इनका सबसे बड़ा खर्चा इनका खुद का शो-ऑफ होता है। करोड़ रुपये की स्पोर्ट्स कार और लग्जरी लाइफस्टाइल मेंटेन करने में ही इनका आधा पैसा चला जाता है। लॉन्ग-टर्म सेविंग्स के नाम पर इनके पास कुछ नहीं बचता।
3. मोहल्ले की आंटी वाला ‘सिम्पैथी सिंडिकेट’

यह जो यूट्यूब बनाम बॉलीवुड या क्रिएटर बनाम एक्टर का फेक नैरेटिव बनाया गया है, यह पूरी तरह से एक सोची-समझी रणनीति है। जब भी कोई क्रिएटर किसी रियलिटी शो में जाकर अपनी तमीज का जनाज़ा निकालता है, तो पूरी यूट्यूब कम्युनिटी उन्हें सुधारने की सलाह देने के बजाय एक ‘सिम्पैथी कार्ड सिंडिकेट’ चला देती है।
इस टॉक्सिक एकता के पीछे का असली सच यह है:
- गलतियों पर पर्दा डालना: घर के अंदर स्काउट ने बीमार काज़ी तौकीर को गलत तरीके से खाना दिया, लड़कियों को धमकियां दीं, और जब होस्ट ने डांटा तो बोलने लगे कि “बिग बॉस ने उनको फीड किया होगा” [r/biggboss]। लेकिन बाहर बैठे उनके गेमिंग सर्कल के दोस्तों ने वीडियो बनाकर क्या बोला? “स्काउट का कैरेक्टर एसासिनेशन किया जा रहा है, बिग बॉस 24 घंटे के फुटेज को एडिट करके उन्हें विलेन दिखा रहा है।”
- कल्ट फैनबेस का गलत इस्तेमाल: इन क्रिएटर्स को पता है कि उनके पास एक ऐसी इंटरनेट आर्मी है जिसे गहराई से सोचना नहीं आता। ये इन्फ्लुएंसर्स खुद को ‘विक्टिम’ दिखाकर उन बच्चों को बड़े एक्टर्स और होस्ट्स के सोशल मीडिया हैंडल्स पर गाली-गलौज करने के लिए छोड़ देते हैं।
- असुरक्षा की भावना: इन्हें अंदर ही अंदर डर होता है कि अगर एक यूट्यूबर का फेक बबल फूटा, तो धीरे-धीरे पूरी कम्युनिटी की क्रेडिबिलिटी खत्म हो जाएगी और ब्रांड्स उन्हें पैसा देना बंद कर देंगे। इसीलिए ये लोग मोहल्ले की उन आंटियों की तरह आपस में जुड़ जाते हैं जो अपने घर के बदतमीज बच्चे की गलती पर भी पर्दा डालती हैं।
लेकिन इस पूरे कचरे में मोर्टल (नमन माथुर) जैसे लोग एक बड़े अपवाद (Exception) हैं। मोर्टल ने इतनी कम उम्र में सबसे ज़्यादा फेम और सक्सेस देखी, पर उन्होंने कभी अपनी तमीज, विनम्रता और ज़मीन से अपना नाता नहीं छोड़ा। उन्होंने कभी किसी कॉन्ट्रोवर्सी में पड़कर गाली-गलौज नहीं की और ना ही कभी ऐसा टॉक्सिक ग्रुपिज्म किया। यही वजह है कि पूरा देश मोर्टल की इज़्ज़त करता है और बाकी अहंकारी लोगों को ट्रोल करता है।
4. सोशल मीडिया और पेशेंस का खात्मा: दिमाग का डोपामाइन एडिक्शन
आज के समय में लोगों का पेशेंस (सबर) बिल्कुल खत्म हो चुका है, और इसका सबसे बड़ा मुजरिम सोशल मीडिया ही है। सोशल मीडिया ने हमारे इंसानी दिमाग के काम करने के सिस्टम को पूरी तरह बदल दिया है:
- इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन (तुरंत खुशी): 15-सेकंड के इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉट्स ने हमारे दिमाग को ऐसा ट्रेन कर दिया है कि अगर कोई चीज़ 5 सेकंड में हमारे मुताबिक नहीं हुई, तो हम स्क्रीन स्क्रॉल कर देते हैं। जब रियल लाइफ में कोई इंसान हमारी बात नहीं मानता या थोड़ा समय लेता है, तो हमारा दिमाग स्क्रॉल नहीं कर पाता, और वो गुस्से में बदल जाता है।
- डोपामाइन का एडिक्शन: हर लाइक, नोटिफिकेशन और चैट कमेंट पर दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है, जो नशे की तरह काम करता है। रियल-वर्ल्ड कन्वर्सेशंस और प्रोफेशनल्स की स्टेबल जॉब्स में इतना जल्दी डोपामाइन नहीं मिलता, इसीलिए लोग आम ज़िंदगी में बहुत जल्दी चिड़चिड़े हो जाते हैं।
- इको चैंबर्स (सिर्फ अपनी बात सुनना): सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। इस वजह से लोगों को लगने लगता है कि “जो मैं सोचता हूँ, वही पूरी दुनिया सोचती है।” जब रियल लाइफ में कोई उनसे अलग नजरिया रखता है, तो वे उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और सीधा लड़ने लगते हैं।
- कीबोर्ड वॉरियर्स का एटीट्यूड: स्क्रीन के पीछे बैठकर किसी को भी गाली देना बहुत आसान हो गया है क्योंकि वहां कोई पलट कर मारने वाला नहीं होता। धीरे-धीरे यह ऑनलाइन बदतमीजी लोगों के रियल बिहेवियर में उतर आई है। रियलिटी शोज़ के टॉक्सिक इन्फ्लुएंसर्स इसी स्क्रीन-कल्चर की पैदाइश हैं।
5. द डाउनफॉल थ्योरी: प्लास्टिक फेम की शेल्फ-लाइफ

बाहर से देखने पर लगता है कि इनका क्रेज कभी खत्म नहीं होगा और ये 5-10 साल में इतना पैसा कमा लेंगे जो इनकी पूरी ज़िंदगी चलेगा। लेकिन फाइनेंस और रियलिटी का नियम है—जो पैसा जितनी जल्दी और बिना सही क्वालिफिकेशन के आता है, वो उतनी ही तेज़ी से हाथ से निकल भी जाता है।
इन्फ्लुएंसर्स का डाउनफॉल बहुत अचानक और भयानक होता है, जिसके ज़िंदा सबूत हमारे सामने हैं:
- द यूके07 राइडर (अनुराग डोभाल): एक समय पर इनके पास मिलियंस में व्यूज थे। बिग बॉस 17 में होस्ट और मेकर्स से पंगा लेने और फेक ईगो दिखाने के बाद आज उनका व्यूज ग्राफ और ब्रांड वैल्यू 80% तक नीचे गिर चुकी है। उनका बबल पूरी तरह फूट गया।
- पुनीत सुपरस्टार: रियलिटी शो में आते ही मेकर्स पर चिल्लाने और बदतमीजी करने की वजह से 24 घंटे में निकाल दिए गए। शुरुआत में उनके फैंस ने बहुत हवा बनाई, पर वही एक जैसा लाउड और टॉक्सिक कंटेंट देख कर ऑडियंस बोर हो गई। आज उनका क्रेज लगभग खत्म है।
- स्काउट ओपी का करंट सीन: स्काउट का गेमिंग व्यूज ग्राफ पिछले 2-3 सालों से पहले ही ड्रॉप हो रहा था, जिसे बचाने के लिए वे बिग बॉस 20 में आए। लेकिन यहाँ आकर उन्होंने सरेआम अपनी 5 साल की कमिटेड रिलेशनशिप (काश्वी हिरानंदानी) को हर्ट किया, लाइव कैमरा पर लव गिल के लिए पजेसिवनेस कन्फेस की, और काश्वी को स्ट्रीमिंग से ब्रेक लेने पर मजबूर कर दिया। इस डबल-फेस एक्सपोज़र के बाद उनके खुद के 70% से 90% हार्डकोर फैंस उनके खुद के सबरेडिट्स और पेजेस पर उन्हें ट्रोल कर रहे हैं [r/biggboss]। ब्रांड्स और स्पॉन्सर्स अब ऐसे क्रिएटर्स से दूरी बनाना शुरू कर चुके हैं।
6. यह बीमारी कब और कैसे खत्म होगी?
देश का एक बड़ा हिस्सा जब तक एजुकेशन, अवेयरनेस और क्रिटिकल थिंकिंग से दूर रहेगा, तब तक कॉर्पोरेट्स और रियलिटी शोज़ के मेकर्स ऐसी टॉक्सिक चीजों को बेचते रहेंगे क्योंकि उन्हें सिर्फ टीआरपी और व्यूज से मतलब है। लोगन पॉल को डब्ल्यूडब्ल्यूई (WWE) में बुलाकर चैंपियन बनाना इसी कॉर्पोरेट लालच का ग्लोबल उदाहरण है।
लेकिए यह कचरा हमेशा नहीं चलेगा। इस बबल को पूरी तरह साफ़ होने में 1 से 2 जनरेशन्स (50-100 साल) का समय लग सकता है, और यह तभी बदलेगा जब:
- ऑडियंस मैच्योर होगी: जैसे-जैसे इंटरनेट पुराना होगा, आने वाली पीढ़ियां इस सस्ती गाली-गलौज और स्ट्रीमिंग के कचरे से बोर हो जाएंगी।
- बायकाट का असर: जिस दिन जनता ने इन टॉक्सिक रियलिटी शोज़ और बेटिंग ऐप्स को प्रमोट करने वाले क्रिएटर्स को देखना बंद कर दिया, इनकी टीआरपी ज़ीरो होते ही बड़े प्लेटफॉर्म्स इन्हें धक्के मार कर निकाल देंगे।
निष्कर्ष
लंबी रेस में हमेशा एक पढ़ा-लिखा प्रोफेशनल ही जीतता है जिसके पास रियल-वर्ल्ड स्किल्स हैं। प्रोफेशनल्स अगले 25 साल तक मार्केट में इज़्ज़त से काम करते हैं, उनका स्टेटस ग्रो करता है, और उन्हें अपना घर चलाने के लिए किसी 14 साल के बच्चे के पेड व्यू या बॉट वोटिंग पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
इन्फ्लुएंसर्स का पैसा एक प्लास्टिक फेम (नकली शोहरत) है। 5 साल बाद जब इनका क्रेज खत्म होगा, तो इनके पास रियल वर्ल्ड में सर्वाइवल के लिए कोई स्किल नहीं बचेगी। आम जनता का दिल वही जीत सकता है जिसके पास काज़ी तौकीर और गुल्लू जैसे लोगों की तरह तमीज, समझदारी और डिग्निटी (गरिमा) हो। इंटरनेट का यह टॉक्सिक बबल एक दिन ज़रूर फूटेगा, और ज़मीन पर सिर्फ असली मेहनत और तमीज ही टिकी रहेगी।